सीरिया की बश्शार असद सरकार को गिराने के लिए ओबामा और ट्रम्प की सरकारों ने सैकड़ों अरब डालर की रक़म ख़र्च कर डाली मगर यह सरकार अब भी मौजूद है और सीरियाई सेना देश का 80 प्रतिशत भूभाग विद्रोहियों के क़ब्ज़े से आज़ाद करा चुकी है।
इससे भी बड़ी बात यह है कि दस साल तक जारी रहने वाले गृह युद्ध के बावजूद सीरियाई सेना पूरी मज़बूती के साथ मौजूद है और अपना दायित्व निभा रही है।
यह स्वाभाविक है कि फ़िल्टमैन इन तथ्यों को अपनी ज़बान से नहीं बयान करते और न ही वह यह बताते हैं कि सीरिया के ख़िलाफ़ अमरीकी एजेंडा फ़ेल होने की बुनियादी वजह ईरान, रूस और हिज़्बुल्लाह का सामने आ जाना था जिन्होंने बड़ी ज़िम्मेदारी से सीरियाई सरकार की रक्षा की।
फ़िल्टमैन के बयान में एक ख़तरनाक बात यह थी कि उन्होंने कहा कि सैनिक विकल्प नाकाम हो जाने के बाद अब कठोर आर्थिक प्रतिबंधों के विकल्प को इस्तेमाल करके लक्ष्य पूरा किया जाएगा। उन्होंने कहा कि यह प्रतिबंध केवल सीरिया नहीं बल्कि ईरान और रूस पर भी लगाए जाएंगे।
अमरीका ने उत्तरी कोरिया और ईरान के मामले में आर्थिक प्रतिबंधों की नीति अपनाई और इसका उल्टा नतीजा सामने आया। इन दोनों देशों की ताक़त में हम लगातार विस्तार देख रहे हैं। यह दोनों देश तेज़ी से आत्म निर्भर होते जा रहे हैं। रक्षा उद्योग और विशेष रूप से मिसाइल शक्ति में इन दोनों देशों का लोहा सारी दुनिया मानती है।
वैसे कई साल से अमरीका ने सीरिया के ख़िलाफ़ कड़े प्रतिबंधों की नीति अपना रखी है। इसी नीति के तहत उसने स्थानीय कुर्दों के साथ मिलकर सीरिया के तेल व गैस के भंडारों और उपजाऊ ज़मीनों पर क़ब्ज़ा कर रखा है और इसका असर भी हुआ है क्योंकि सीरिया में ईंधन की समस्या पैदा हो गई मगर यह भी तय है कि सीरिया इस स्थिति का मज़बूती से सामना कर रहा है।
फ़िल्टमैन ने जब यह मान लिया कि सीरिया, ईरान, लीबिया, इराक़ और पश्चिमी एशिया में ओबामा और ट्रम्प दोनों की नीतियां फ़ेल रही हैं तो उन्हें यह मांग भी करनी चाहिए थी कि इन नीतियों में बुनियादी बदलाव किया जाए और इन नीतियों को छोड़कर वार्ता और सहयोग का रास्ता अपनाया जाए। वरना अमरीका की नाकामियों की सूची इसी तरह लंबी होती जाएगी।
स्रोतः रायुल यौम